दिल्ली हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, अस्थायी वेंडिंग सर्टिफिकेट से पक्की दुकान का हक नहीं

दिल्ली हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि जिन स्ट्रीट वेंडर्स के पास प्रोविजनल यानी अस्थायी सर्टिफिकेट ऑफ वेंडिंग (CoV) हैं, उन्हें स्थायी या पक्की दुकानें स्थापित करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। यह महत्वपूर्ण फैसला जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह और जस्टिस विकास महाजन की खंडपीठ ने 42 स्ट्रीट वेंडर्स की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुनाया है। याचिकाकर्ताओं ने अपने अस्थायी परमिट के आधार पर स्थायी दुकानें या फिक्स जगह की मांग की थी।
अदालत ने अपने आदेश में साफ कहा है कि प्रोविजनल CoV केवल मोबाइल यानी घूम-घूमकर रेहड़ी-पटरी लगाने के लिए होते हैं। इन सर्टिफिकेट के नियमों के मुताबिक वेंडर्स एक ही जगह पर 30 मिनट से ज्यादा नहीं रुक सकते हैं। इसके अलावा, किसी भी तरह का पक्का ढांचा बनाने पर पूरी पाबंदी है और वेंडर्स के लिए यह जरूरी है कि वे फुटपाथों पर कब्जा न करें और ट्रैफिक जाम न लगने दें। अदालत ने माना कि फोटोग्राफिक सबूतों से यह साबित हुआ है कि कई याचिकाकर्ता पक्की दुकानें चला रहे थे और पैदल चलने वालों का रास्ता रोक रहे थे, जो नियमों का उल्लंघन है।
इस मामले में अदालत ने नगर निगम (MCD) को निर्देश दिया है कि वह सभी 42 याचिकाकर्ताओं के अस्थायी CoV की पूरी तरह से जांच करे। सत्यापन प्रक्रिया पूरी होने के बाद, MCD इन लोगों को केवल नियमों का पालन करते हुए मोबाइल वेंडर के रूप में काम करने की अनुमति दे सकता है। अदालत ने यह भी नोट किया कि इस मामले में प्रक्रियात्मक कमी थी क्योंकि अदालत के आदेश के बावजूद 42 में से केवल एक याचिकाकर्ता मणिक चंद ने ही अपना हलफनामा दाखिल किया था।
अदालत का यह रुख है कि अस्थायी प्रमाण पत्रों के तहत वेंडर्स को स्थायी जगह का दावा करने की अनुमति देना मोबाइल वेंडिंग नियमों के मूल उद्देश्य के खिलाफ होगा। इस फैसले से साफ है कि अस्थायी वेंडिंग परमिट सिर्फ घूमकर सामान बेचने के लिए ही मान्य हैं।