दिल्ली उच्च न्यायालय में सत्य निकेतन पीजी हादसे की जनहित याचिका में किरण बेदी के पक्ष में शामिल होने पर केंद्र सरकार ने किया विरोध

नयी दिल्ली। केंद्र सरकार ने गुरुवार को दिल्ली उच्च न्यायालय में पूर्व आईपीएस अधिकारी और पूर्व पुदुचेरी उपराज्यपाल किरण बेदी की उस याचिका का विरोध किया जिसमें उन्होंने सत्य निकेतन में एक पेइंग गेस्ट आवास के ढहने से जुड़े मामले में पक्षकार बनने की मांग की थी। इस हादसे में सात लोगों की जान चली गई थी। केंद्र की ओर से पेश हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की खंडपीठ को बताया कि उन्हें इस आवेदन का विरोध करने के निर्देश मिले हैं। उन्होंने कहा कि बेदी इस मामले से जुड़े मुद्दों पर पहले ही अपनी राय व्यक्त कर चुकी हैं और इसलिए मामले में पूर्व में ही निर्णय ले चुकी हैं। अदालत ने केंद्र को अपना जवाब दाखिल करने के लिए तीन दिन का समय दिया है। सुनवाई के दौरान, पीठ ने टिप्पणी की कि घटना से उत्पन्न होने वाले मुद्दों की जांच में बेदी का प्रशासनिक अनुभव उपयोगी हो सकता है। अदालत ने कहा कि वह देश की एक जिम्मेदार नागरिक हैं और उनके पास पर्याप्त अनुभव है। यह बड़े पैमाने पर जनहित का मामला है और उनके लंबे अनुभव का उपयोग किया जा सकता है। हालांकि, अदालत ने गुरुवार को बेदी की याचिका पर कोई अंतिम फैसला नहीं लिया। यह जनहित याचिका अनिकेत कुमार गुप्ता द्वारा सत्य निकेतन में पीजी आवास के गिरने के बाद दायर की गई थी, जिसमें सात लोगों की मौत हो गई थी। इस याचिका में पीड़ितों के परिवारों के लिए एक करोड़ रुपये के मुआवजे और दिल्ली में पीजी आवासों और हॉस्टलों के संरचनात्मक ऑडिट की मांग की गई है। उच्च न्यायालय ने पहले एमसीडी को यह पता लगाने के लिए उच्च स्तर पर जांच करने का निर्देश दिया था कि क्या गिरा हुआ भवन वैध अनुमति से बनाया गया था। अदालत ने पीजी आवासों में रहने वाले छात्रों का विवरण भी मांगा था और एमसीडी से यह स्पष्ट करने को कहा था कि क्या दिल्ली में ऐसे प्रतिष्ठानों को वैधानिक या कार्यकारी नियम नियंत्रित करते हैं। इस मामले की अगली सुनवाई 25 सितंबर को तय की गई है। आवेदन में आरोप लगाया गया है कि इस क्षेत्र के कई पीजी हॉस्टल और इमारतें कथित तौर पर स्थानीय राजनीतिक प्रतिनिधियों, उनके परिवारों या सहयोगियों से जुड़े लोगों द्वारा चलाई जा रही हैं, जिससे वे वैधानिक और सुरक्षा आवश्यकताओं को दरकिनार करने में सक्षम हो रहे हैं। इसमें यह भी दावा किया गया है कि असुरक्षित आवासों से जुड़ी बार-बार की घटनाएं यह सवाल उठाती हैं कि क्या स्थानीय अधिकारियों को ऐसे उल्लंघनों की जानकारी थी लेकिन उन्होंने कार्रवाई नहीं की। आवेदक ने उच्च न्यायालय से एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक समिति गठित करने का अनुरोध किया है ताकि इस मामले की जांच की जा सके और रिपोर्ट सौंपी जा सके।